सिले होंठ उनके .....सिले होंठ उनके .....
करीने से काढ़ी जुल्फ़े सनम के
अब लम्बी बेताबी तपन की कहानी
मेरे सुख में भी है दुःख की जवानी
ये जीवन का हिस्सा तुम्ही से निभानी
नाराजे भी सुन लू कसम से नमन से
सिले होंठ उनके ....सिले होंठ उनके ....
मैं हांथो से होंठो को जब जब मिलाऊँ
कभी तू ना रोके तभी तो मुस्काऊँ
है चंचल जो मन की तीरथ भी कराऊँ
मैं हृदय के दोनों तरफ को रिझाऊँ
तुम्हारा हूँ पूरक सभी ही दिशा में
तरुण ही रहूँगा किसी भी दशा में
किस्मत भी छोड़ें तेरे ही करम से
सिले होंठ उनके .....सिले होंठ उनके .....
मैं पांवो पे प्यारी खरोचे लगाऊँ
सफ़र से शुरु शिखर तक ले जाऊँ
तेरे साथ जागा तेरे रात जागा
अन्दर बैठा है लपट ये अभागा
लपट पे तू मारे लपट तू बघारे
अब आग-ए-तपिस को तू ही सवारे
सिले होंठ उनके ...सिले होंठ उनके .....
~ आदर्श कुमार


