अपने पौधों की खुद बागबाँ को ही कदर नहीं,
अचरज है यहाँ इंसान को इंसान की कदर नहीं।।
मैं कौन हूँ? कहाँ हूँ? खुद मुझे कुछ ख़बर नहीं,
यूँ है सारा जमाना साथ चलने को रहबर नहीं।।
इस फ़टे ढोल से क्या खाक़ कोई धुन निकलेगी,
उखड़े है सब सुर,अब जिंदगी में कोई बहर नहीं।।
बरस रही है आग धरती पर आसमाँ से धूप बन,
जल जाएगी आदमी यहाँ कोई हरा शज़र नहीं।।
लुट रही है अस्मत हर रोज बहू-बेटियों की यहाँ,
जिंदा लाशों का कब्रिस्तान है ये कोई शहर नहीं।।
©लफ्ज़_abp


