कल शाम मैंने उसको अपनी गली के नुक्कड़ पर देखा,
मैंने आवाज़ लगाई, अरे भाई सुनो...
फिर पास जाकर कहा, अरे भाई सुनो कहाँ रहते हो
आजकल दिखाई ही नही देते बिलकुल..
क्या घर बदल दिया है, क्या?
उसने मुस्करा कर कहा,
नही अब तो मेरे पास घर ही नही है,
मुझे कोई अपने घर में नही रखता..
सब लोग अब भाग दौड़ में व्यस्त हैं,
किसी को मेरी परवाह ही नही है।
किसी को क्या फर्क पड़ता है मेरे होने न होने से।
अब मैं अकेला ही यूँ भटकता हूँ, किसी के पास नही रहता अब मैं....
इतना कह कर उसने एक मुस्कान दी और चल दिया।
हाँ, सही कहा उसने वो मेरे पास भी नही था।
मैं उसे देखता रहा, तब तक जब तक वो रात के अँधेरे में खो नही गया।
वो समय था जो अब हममे से किसी के पास भी नही रहता।..