कैसे भूल सकता हूँ रात चुपके से तेरा आना
तुम्हारा कोमल हाथों से मेरी पलके छुपाना,
फिर धीरे से मेरे कान पे तुम्हारा दस्तक देना।
कैसे भूल सकता हूँ रात तुम्हारा हाथ थाम
के खुले आकाश में घण्टों तारों को निहारना,
ढलती रात के साथ तुम्हारा मेरे क़रीब आना
कैसे भूल सकता हूँ रात तुम्हारा होठों से छूना,
फिर शरमा के नज़रें झुकना।
हमारे दिल में हिलोरे मारते एहसासों को,
घबरा कर तुम्हारा मेरे सीने से लिपट जाना
कैसे भूल सकता हूँ हर रात जिनमे तुम हो।।
वो रात जैसे कोई कविता हो जिसको पढ़ता
हूँ मैं,जिसमे खोता जाता हूँ।।।