मुकम्मल आदमी ढूँडा ज़माने में 
मिले वो आख़िरश मुझको फ़साने में

मैं तेरी राह का पत्थर नहीं हूँ दोस्त
समय ज़ाया न कर मुझको हटाने में

हज़ारों ग़लतियाँ कर बैठता हूँ ख़ुद
किसी की एक-इक ग़लती गिनाने में

अगर ऐसे ही इंसाँ होने थे तो फिर
समय ज़ाया हुआ जन्नत बनाने में

दिल-ए-हसरत न कर हँसने की हसरत अब
ये शय है ही नहीं अपने ख़ज़ाने में 

यक़ीनन इंतिहा पर आ गया रिश्ता
लियाक़त आ गई बातें बनाने में

उन्हें तो शाख़-ए-दिल आबाद करनी थीं
बहारें लग गईं पत्ते गिराने में