हमें चलना पसंद था

हर पल चलते जाना

मैं हर पल चलते हुए उन पलों को

अपने अंदर समेटना चाहता था

और वो- बस यूँ हीं बिंदास चलते रहना

मैं चलते-चलते कुछ पल रुककर

उन्हें अपने अंदर समेट लेता

और वो बस बिंदास चलती जाती

मैं पलों को समेटने में पीछे रह गया

और वो बिंदास चलती चली गई

कुछ दिनों बाद जब कहीं भीड़ में मिले

मैंने उसे दूर से ही पहचान लिया

और उसने करीब आकर मेरा नाम पूछ लिया।


©️अच्युत अभिषेक (Achyut Abhishek)