ऐ वक्त तेरा निज़ाम जुदा सा लगता है

तू साथ दे तो हर लम्हा खुदा सा लगता है

तू दूर तो हर शै और नाता सपना सा लगता है

तू पैमाना है के पराया कौन और कौन अपना है

माशूका की तरह तू रूठता मानता है

नज़ाकत का खेल तू खूब जानता है

तेरी नजर सीधी तो ज़िंदगी खूब लगती है

नज़र फिरे तो बर्फ़ भी धूप लगती है

तू दिखता नहीं पर है तो तू कहीं जरूर

 फूंक दिया तूने जाने कितनों का गुरूर