Poetry 1 min read 382.1K reads

पिघले चले गए


बिखरे तो इस कदर के बिखरते चले गएअपनों के फरेब पे भी पिघले चले गएकोशिशें तमाम की कि कुछ सम्भल के चलेंदुनिया के कालीन पे फिसलते चले गएबिखरे तो इस कदर के बिखरते चले गए

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