ये कौन रहा है चीख कौन ये चिल्ला रहा है

इंसान की जलालत का कौन ये मातम माना रहा है

जो समझ बैठे थे खुदी को खुदी का खुदा

आज किसकी सलामती की किससे मांग रहे हैं दुआ

यूं तो सब बंद था पर हर वक़्त खुली थी इक दुकान

गली गली में बेच रहा था खून इंसान का इंसान

नक़ाब चहरे पर था आधा पर ज़मीर तमाम ढका था

जख्मों के गलीचे पे हैवानियत का तम्बू खूब गड़ा था

कुत्तों के श्मशानों में फूंकना पड़ा इंसान को

कई फुकने की गुहार लगाते रहे भगवान को

हवा में ज़हर दिलों में ज़हर रूहें सभी की बंजर

कई बार खुद टूटा होगा खुदा तो दिखाया ये मंज़र