हांजी ज़माने वालों

बुर्खे का मतलब घूँघट/ पर्दा होता है।

मुझे नही समझ आ रहा कि एक आदमी कैसे महिला विरोधी हो सकता है।

अरे! भाई औरत शब्द का अर्थ होता है छुपाने की चीज़।

लेकिन साथ मे यह भी जानना होगा कि औरत कोई चीज़ नही है।

कभी कभी नेता लोग इतनी स्तरहीन हो जाते है कि कुछ भी बोल जाते है सिर्फ इसलिए कि समर्थन देने वालों की भीड़ और बढ़ जाये अब चाहे उनके द्वारा कहे गए शब्द सूल की तरह कितनो में मन मे घातक असर दिखा जाए।

मैं Abrar Roshan आप सभी के सामने किसी एक का पक्ष नही करता और रट्टू तोता तो मुझे नही बनना होता। अक्सर धारा के विपरीत रहता हूँ।


समाज का अर्थ क्या है यह मुझे बतलाओ.?

हम सभी किसी न किसी समाज/ वर्ग से जुड़े होते है और हमारी पूरी पूरी जिम्मेदार बनती है कि समाज/वर्ग का पूर्णतयः ध्यान रखे।

लेकिन हम सब अपने निजी जीवन मे परिवार और सामाजिक जीवन मे सम्पूर्ण समाज/वर्ग जगत का ख़्याल चाह कर भी नही रख पाते।


ग्रा० RD 860 ( बागड़ सर) और बिठनोक मामले मैं मुझे कहने और लिखने की कोई आवश्यकता नही थी और आज भी शायद लिखने/ कहने की कोई ज़रूरत है।

 

 मैं सआदत हसन मंटो और दुष्यंत कुमार जैसों को पढ़ता हूं खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान, सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे लोग मेरे आदर्श है।


860RD- बिठनोक मामले में जो हुआ वो हरिराम जी के लिए कठिन तप जैसा है उनकी आह और पीड़ा से मेरा मन भी दुःखी होता है और तो और मेरी सहानुभूति उनके साथ है लेकिन ये क्या देख रहा हु मैं की एक सज्जन पुरुष मकराना जैसी जगह से आते है और बुर्खे पर बोलते है मैं यह तो नही कहता कि बुरखा आप भी धारण करो लेकिन जो धारण किये हुवे है उनकी इज्ज़त आपको सदैव करनी चाहिए।

मेरी पड़ नानी जी जो आज भी जिंदा है जो सुन नही सकती पहले की तरह तंदरुस्त नही है लेकिन वो अपने वक़्त की नर्स रही है जिन्होंने अपना जीवन बीकानेर के राज घराने की सेवा में गुज़र दिया और आप बुर्खे फाड़ने की बात करते हो।

मेरा ननिहाल मुग़ल परिवार से है जिनके लिए आज भी बीकानेर राजघराना सर्वोपरि है।

मेरे बड़े मामा जी सलीम मुग़ल कृष्णा राठौड़ बाईसा को जिम्मेदारी के साथ राजकीय डूंगर महाविद्यालय छोड़ कर आया करते थे और हमेशा मान सम्मान पाया।

राज घराने के हर कार्यक्रम में सदैव साथ रहा आप आइए साथ बैठे बैठे पुरानी यादों की संदूक से सारी तारीख़ी तस्वीरें आपके सामने पेश करता हु।


तब भी कोई धार्मिक भावनाओं को ठेस नही पहुंची क्योंकि आप जैसे लोग तब दुनिया मे नही थे।

आज आप जैसे है लेकिन वो पहले सा प्रेम नही रहा।

शायद दिक्षा शिक्षा के चलते आप श्रीमान घर परिवार से दूर रहे इसलिए शायद कभी प्रेम ना समझ पाए।

अंत मे आपको एक बात कहता हूं जिससे शायद आपको कुछ याद आ जाये

जब कोई परिवार राज घराने में काम करता या सम्बन्ध रखता तो पहले कपड़े राज परिवार पहनता परखता फिर बाकी को सप्रेम भेंट करता अब आप कह रहे हो कि बुर्खे फटेंगे तो सोचिये की आप किनको बेपर्दा करने का कहे रहे है।

ददिहाल का इतिहास मैं अगले ब्लॉग में लिखूंगा तब तक शेयर कीजिये और पढिये।

कोई पहलू समझ न आये तो बतलायें।


स्वतंत्र क़लमकार

आपका दोस्त-

  अबरार रोशन 

 पूगलगढ़, बीकानेर।