तेरा अंजुरी भर प्रेम, मेरा भवसागर,मैं प्रेमतृष्णा तू प्रेम का ढाई आखर।तू वृंदावन की सांझ की पावन बेला,मैं मरूभूमि उगा कोई वृक्ष अकेला।
तेरा अंजुरी भर प्रेम, मेरा भवसागर,मैं प्रेमतृष्णा तू प्रेम का ढाई आखर।
तू वृंदावन की सांझ की पावन बेला,मैं मरूभूमि उगा कोई वृक्ष अकेला।