अंतरिक्ष की सैर

पहाड़ो की खाँक

नदीयों की तलहटी

गर्भ धरती का

सब देख लिया है

मानव सभ्यता नें

क्या कुछ नही किया है

रोमांच के वशीभूत होकर

स्वयं के विकट अभिमान में

एक मजदूर 

गाँव देहात का

दिन के दो पैसे जुटा लेने में

वो सारे रोमांच ढुंढता है

पेट के भूख तृप्त कर लेने मे ही

अपनी सर्वस्व अर्जित उर्जा झोंक देता है

कौन महान है

किसका पलड़ा भारी कहा जाये

तुम संपत्ति के अकड़ मे

हजारो लाखो के भूख को 

तृप्त कर सकने की हैसियत 

रखने के बावजूद

कर क्या रहे थे? 

मजदूर के अनुभव की बराबरी ही तो! 

क्या बड़ा किया तुमने? 

क्या ऐसा किया जो! 

मानव मात्र को पोषित करता हो

वातावरण को पुष्ट करता हो

सरल और पुष्ट जीवन करता हो! 

अरे! रहो अपने महल अटारी में

बराबरी मत करने लग जाना

अनुभव में मजदूर और गरीब के

वो तुम्हारे सुवर्ण को ताज नही बनाता

वो इनको अपनी आंतो मे रोज पचा डालता है

हाँ सही सुना! 

वो इनको रोज अपनी आंतो मे पचा डालता है!