" बनारस " इस शहर की मिट्टी में है जीवन का सार, धरती भी मिली हमे, और स्वर्ग भी है पास। पड़ी जहां जन्मी धरती में सूरज की पहली किरण, बनाया था जिसे महादेव ने मोझ प्राप्ति की डगर। आया हूं पुन्य की इच्छा लेकर उसी विश्वनाथ के घर, पाप भी धो रहा हूँ मैं पावन गंगा के तट पर। जाने किन हवाओं का हैं यहां असर, हरे केसरिया भी मिल रहे हैं एक ही गली के नुक्कड़ पर। आया था इस शहर में मैं सब कुछ अपना खोकर, जा रहा हूँ अब मैं वापस लबों की मुस्कां लेकर।


