कुछ बेचैनिया ऐसे भी है
जिसका कोई अंत नही....
कितना भी मैं ख़ुद को उठा लू
गिरने का कोई अंत नहीं....
क्याँ रखा है उसकी याद में
भूल जाँ उसको याद ना कर..
झाँक कर देखा दिल के अंदर
उसके यादो का अंत नहीं.....
मुस्कुराया और पूछा एक दिन
जी लोगे ना मेरे बिन...
झूठे वादे झूठे क़समे, साथ भी उसका झूठा था
कितनी लम्बी है ये रातें...इन रातो का अंत नहीं
-अगम मिश्र

