बादल तुम तो बहुत मूर्ख निकले

बरस तो तुम पाए नहीं आए थे बड़े गरजते हुए

तुम्हें ही तो अंधकार प्रिय था

वह स्वर्ण किरणों का स्रोत, वह प्रकाश का प्रतीक

वह ईश्वर-मुख सूर्य था तुमसे कोसों दूर जिसे तुमने छुपाना चाहा

अपने प्रकाश को विश्व भर में सिंचित करता वह आज भी अपना कर्तव्य पालन कर रहा था

दोपहर तुम कहीं से उड़ते आए और उसे ढक दिया

येन-केन-प्रकारेण तुम उसे छुपाने में लगे रहे

उसकी तीक्ष्ण किरणें तुम्हें चीरकर निकलती रहीं

और तुम उसे छुपाने में लगे रहे

अब शाम हो चुकी है

अपनी आँखें खोलो और देखो चारों ओर

देखो कि वो चला गया हऔर देखो खुद को देखो कि वो जाते-जाततुम पर भी अपना रंग छोड़ गया...............