अगर मिला कहीं बचपन मुझे

कैसे मिलूंगा उससे मैं


जो उसने देखा था सपना

सच मैं कर न सका

कैसे कहूँगा उससे मैं


जिसने उड़ने के लिए कभी

पंख फैलाए थे अपने

जब वो भागता हुआ

आएगा मेरे पास

साथ कैसे चलूँगा उसके मैं


जो वादा कल उसने किया था मुझसे

ऐसे ही कितने वादे करता हूँ आज भी

अपने आने वाले कलों से मैं

सामने कैसे मन की ये बात रखूँगा उसके मैं