"माता पिता एक एहसास"
लिखता तो क्या लिखता बारे में उनके,
किसी के लिए वो माता पिता का रूप,
तो किसी के लिए भगवान की तरह होते हैं,
किसी के लिए एक दुनिया का स्वरूप,
तो किसी के लिए पूरा संसार होते हैं,
उनका हर वक़्त, हर पल बिना किसी लालच साथ देना हमें,
भूलकर अपने दर्द और खुशियों को बांट देना हमें,
बिना किसी उम्मीद अपना सबकुछ त्याग देना हमें,
अक्सर भूलकर सबकुछ माफ़ कर देना हमें,
उनका होना हर मुश्किल में मजबूत बनाता है हमें,
उनका ना होना गंभीर मौन का एहसास दिलाता हैं हमें,
उनकी यादें और बातें हरपल महसूस होती है हमें,
उनकी सीख और संस्कार आज भी याद पड़ती हैं हमें,
उनकी आवाज़ आज भी सुनाई पड़ जाए तो मन तसल्ली देता हैं हमें,
उनका जीवन, उनके आदर्श, उनका संघर्ष हर कदम राह दिखाता हैं हमें,
छुपा कर तकलीफें अपनी, उनका मुस्कुराना याद आता हैं हमें,
नाराज़ होकर मां का खाना खिलाना याद आता है हमें,
अक्सर हमारी खातिर मां का भुखे सो जाना याद आता है हमें,
पिताजी का हमारी खातिर सारी दुनिया से लड़ जाना याद आता हैं हमें,
मुश्किलों में अपने पीछे छुपाना उनका याद आ जाता हैं हमें,
अब घर से निकलना अधूरा सा लगता है हमें,
माता पिता के पैर दोबारा न छू पाना इक मलाल सा लगता हैं हमें,
बूढ़े मां बाप ने हमको अपनी जवानी दी हैं,
भुखे सोए अपने बच्चों की खातिर ऐसी कुर्बानी दी हैं,
धूप से बचने के लिए अब माता पिता की छांव अधूरी हैं,
नींद भुलाकर सुलाया हैं जिस मां ने लोरी उसकी अधूरी हैं,
हज़ारों गलतियां माफ़ करने वाले माता पिता की जगह अधूरी हैं,
झुक कर उनके श्रीचरणों में कोटि कोटि वंदन करते हैं,
एक बार पुनः मन में माता पिता को स्मरण करते हैं ।
(अभिषेक चौरसिया)


