उमीद-ए-करम रखने से वज्ह-ए-मसर्रत बदलती रहती है
अब तो लज़्ज़त-ए-ग़म-ए-हयात की राय बदलती रहती है
कभी आफताब निकलता है कभी बादलों में छुप जाता है
मुरव्वत से दिलों के मिलने-जुलने की ये अंदाज़ बदलती रहती है
वहीं चश्म-ओ-लब वहीं गेशु क़दम क़दम पर मिलते हैं
अब तो "कहानी" की भी तर्ज़-ए-बयाँ बदलती रहती है
अब्र से बिखरी मोतियों के जैसी यादें हैं हमारी
अब तो घुंधली तस्वीरों की तरजुमानी बदलती रहती है
चलो हम भी दानाई से अंदाज़-ए-अय्यारी बदलकर देखते हैं
जैसे बदलते मौसम में उनकी वफ़ादारी बदलती रहती है


