बातें इशारों में होती रहीं

गुमनाम रही और गुमराह रही

जानने को उनको इस कदर कि

शामें ढलती रहीं, बातें चलती रहीं


कुछ बातें मिली, कुछ आदतें

कुछ जहाँ में मुकाम मुकम्मिल हैं

रातों के सपने अगर चाँद हो

उनसे करीब आने का वो सागर करीब है


अगर तेज आरंभ से मिले तो

आग़ाज़ हमें मुनासिब है

अगर उनका इश्क़ कहीं और हो

तो हम इश्क़ के मुलाज़िम हैं


अब तो राहों का मंजर है

और ज़रूरत का इशारा है

या तो तुम हमें मिलो या

चाहतों से तुम्हारे किनारा है