क्या हम कभी दोबारा उन रास्तों पर चलने की हिम्मत कर पायेंगे जिन्हें हम बहुत पहले ही पीछे छोड़ आये थे? 'मैं आखिर मुड़ा ही क्यों था' की टीस न जाने कब से मुझे खाये जा रही थी। मैं एक-दो बार वापस उस रास्ते पर जाने की कोशिश तो की थी, पर आधी दूर चलकर मैं फिर से वापस मुड़ गया। शायद वो रास्ता जिसे मैं पहले छोड़ कर आ गया था, वो अब मुझसे बहुत ही दूर जा चुका है.....बहुत दूर।

मुड़ते-मुड़ते मैं अब उस मोड़ पर आ चुका हूँ जहाँ से मुझे वो पुराना मोड़ बिल्कुल भी दिखाई नहीं देता जिस पर तब मैं मुड़ने की हिम्मत न कर सका। अब तो उसकी परछाई भी मुझे नजर नहीं आती। आता है तो बस एक सपना जो मेरे मन में उसकी यादों को बरकरार रखता है। मगर ये वो सपना नहीं है जिसके अंदर हम सुनहरी सी दुनिया में खो से जाते हैं, बल्कि ये तो बहुत ही भयानक सपना है। ये इतना भयानक है कि मैं इससे डरकर अपनी आंखें भी नहीं खोल सकता क्योंकि तब मेरी इंद्रियां मेरे बस में नहीं होती हैं। मैं कैद होता हूं अपने ही सपने में, तब कोई मेरे जिस्म के हर एक हिस्से को, हर एक कण को खींच रहा होता है.... अपनी तरफ बिल्कुल, हैरी पॉटर के दमपिशाचों (Dementors) की तरह..... और मैं कुछ भी नहीं कर सकता।

- अभिषेक