[किसके नाम के सिंदूर]
कितना भी तुम चाहो मेरा नाम मिटाने की
बार-बार अतीत से तुम घिर जाओगी
तुम्हारे जिस्म पर फ़ेरे हुए अंगुलियों
का निशान किस-किस से छुपाओगी
जब मैं रूठ जाऊ तो
बार-बार कलाई काटने की
ज़ख्म कब तक भरे बाहों से छुपाओगी
और चुपके से मेरा नाम के
ख़त के महक कब तक दबाओगी
बार-बार झुल्फ़े संभालने से
माँग के सिंदूर नहीं मिटेगी
आखिर कब तक
मेरा नाम मिटाने के कोशिश करते रहोगी
चलो गुलाब ही नही सही
ख़ंजर तो लगाओगी
सुनो ! मेरे ज़नाज़ा में तो आओगी
फ़िर तुम जुल्फ़े लहरा लेना
लेक़िन इतना तो बता दो
फिर किसके नाम के सिंदूर लगाओगी।
-अभिषेक पाण्डेय


