वो भी एक ज़माना था,
आज से पच्चीस तीस बरस पहले,
गली थी कुछ सकरी सी मगर,
बड़ा सा घर था, खुला सा आँगन था,
वो भी एक ज़माना था।
सुबह की लालिमा,पंछियों का चहचहाना,
उगता हुआ सूरज,किरणों का जगमगाना,
एक अरसा बीता महसूस किये इनको,
सोने से कम नहीं जो ख़जाना था,
वो भी एक ज़माना था।
जेठ की दुपहरी में,
गली में बर्फ वाले का आना,
एक एक रुपये में पेप्सी का थमाना,
न बीमार होने का डर था,
न तबीयत का बहाना था,
वो भी एक ज़माना था।
साँझ होते ही,घर की छत पर चढ़ जाना,
हर कोने को छत के पानी से भिगाना,
ठंडी जमीं पर अंगड़ाना अलसाना,
तारों को देख पूरी रात को बिताना था,
वो भी एक ज़माना था।
वो यमुना के घाटों पर शाम को जाना,
सीढ़ियों पर बैठ चने चिड़वे को खाना,
दो रुपये थमा कर नाव की सवारी,
इस पार से नदी के उस पार तक जाना था,
वो भी एक ज़माना था।
अब कहाँ है यूं फ़ुरसत, शब-ओ-सहर का ठिकाना,
जुबां पे हर दफ़ा है वक़्त न होने का बहाना,
वो लम्हे अब ख़यालों के आग़ोश में है सिमटे,
ख़्वाबों की अंजुमन में वो फ़कत एक फ़साना था,
वो भी एक ज़माना था ।
- मिराज़ 'अभि'


