आज ज़रा रुका मैं,

थमा मैं, ठहरा मैं,

पलट कर देखा पीछे,

कितने टेड़े- मेड़े रस्तों से,

सैकड़ों मोड़ो से,

गुज़री है ये जिंदगी।

कभी ठहरी नहीं,

कभी थकी नहीं,

गिरी कहीं,

संभली कहीं,

वक्त की पटरी पर,

सरपट दौड़ी ये जिंदगी।

अब सोचा ज़रा मैंने,

इस दौड़-भाग में,

इस रोज़मर्रा में,

कुछ खोया तो नहीं मैंने,

कुछ छोड़ा तो नहीं मैंने,

प्रश्न किया ख़ुद से जो,

व्यंग में मुस्कुरायी जिंदगी।

हँस कर मुझसे बोली वो,

वक्त की धार को,

क्या किस ने रोका है,

तेज बहती मेरी गति को,

क्या किसी ने टोका है,

कितनी भी कोशिश कर ले,

कुछ तो छूट जाना है,

नींद खुलते ही ये,

यादों का दर्पण

टूट जाना है।

टूटे हुए टुकड़ों को,

संजो लेना अपने मन में,

यही असली ख़जाना है।


 - मिराज़ 'अभि'