रात ख़ामोश है, गहरी है, बेचैन भी कुछ,

चली आती है चुप से नज़र बचाते हुए,

बीत जाती है दबे पाँव खुली आँखों से,

अफ़साने मेरे कल के मुझे सुनाते हुए।

चाँद जलाता है क्यूं 

मुझको तू कतरा कतरा,

नज़्म-ए-वस्ल खिड़की पे मेरे गाते हुए,

दो घड़ी बैठ मेरे साथ गुफ़्तगू कर ले,

फ़रमा एहसान मुझ पर

इतना तो अब जाते हुए।


- मिराज़ 'अभि'