रोजमर्रा की भागदौड़ ने ज़िन्दगी जीने का तरीका ही भुला दिया था। रोज लोकल लो, ऑफिस और फिर घर। अब तो यही सब ज़िन्दगी का हिस्सा बन चुका था, मेरे साथ सफर करने वाला हर एक का।

 मगर वो एक ही थी जो इस भीड़ में सबसे अलग थी, उसकी आँखों में अपने सपनों को पूरा करने का जूनून और चेहरे पे चमक अलग ही दिखाई देती थी, और शायद इसीलिए उसके चेहरे का नूर एक अजीब सा सुकून देता था। जब वो हंसती थी तो उसका एक आधा टूटा हुआ दांत मन मोह लेता था। हमारे बीच अभी तक कोई औपचारिक बात नहीं हुई थी बस कभी-कभी आँखों ही आँखों में दुआ-सलाम हो जाती थी।


  वैसे तो आज मेरी छुट्टी थी मगर एक दोस्त को लेने 5:40 वाली लोकल का इंतजार कर रहा था। अचानक सामने से आती वो दिखाई दी, चूँकि हमारे बीच कभी बातचीत नहीं हुई थी तो मैने इशारे से ही पूछा, "क्यूँ इस नूरानी चेहरे का नूर आज बुझा हुआ है?" और उसने भी इशारे से ही "कुछ नहीं हुआ!" कहकर बात ख़त्म कर दी। मगर दिल को कुछ तसल्ली सी नहीं मिली, तो पूरी बात जानने को उनके पीछे चल दिया। स्टेशन के बहार तक ये समझ नहीं आया की क्या पूछू? कैसे पूछू? चूँकि हमारे बीच कभी कोई बात-चीत हुई ही नहीं थी तो आख़िरकार स्टेशन के बाहर आते ही मैंने वो पूछ लिया जो अक्सर नहीं पूछा जाता।

 "चाय पीजिएगा?"

इतना सुनकर वह थोड़ा चौंकी जरूर मगर पीछे मुड़कर कहा- "आप पिलाइएगा?"

"अगर आपका मन होगा तो जरूर!"

 उस दिन चाय की उस छोटी सी दुकान पर बैठकर उसने मुझे वो सारी बातें बता दीं शायद जिन्हे कहकर वो अपना दिल हल्का कर लेना चाहती थी। जब माहौल थोड़ा शांत हुआ तो उसने अचानक पूछ लिया- "ऑफिस नहीं गए आज?"

"छुट्टी थी"

"फिर स्टेशन पर कैसे?"

ये सवाल सुनते ही मानो दिमाग जैसे सुन्न सा हो गया, क्यूंकि तब महसूस हुआ कि पिछले आधा घंटे से हमारा पैर उनसे बात करने की बजह से नहीं हमारे परम मित्र के 23 बार कॉल करने की बजह से काँप रहा था। हमने अब जल्दी से अपने मित्र को फ़ोन लगाया और उनसे विदा ली।

"अच्छा कल मिलते हैं"

"अरे संभलकर जाओ, कल मिलेंगे।"

मगर जाते-जाते एक बात की ख़ुशी थी कि उसके चेहरे का नूर और वो प्यारी सी मुस्कान बापस आ गई थी।


 बातों का सिलसिला अभी भी हमारे बीच उतना शुरू नहीं हुआ था। यूँ तो मैं 5 बजे ही फ्री हो जाता था, मगर बस पलभर उसे देख लेने की आशा लिए स्टेशन की आखिरी बेंच पर 5:40 की लास्ट लोकल का इंतजार करता। वो अपनी सहेली के साथ ट्रैन से उतरती, हाथ में वो नया लिया छाता, कंधे पे बैग और चेहरे पर कभी न ख़त्म होने वाली मुस्कान लिए वो अपनी सहेली कोअपने ऑफिस के किस्से सुनाने में मगन चली जाती और मैं उसके अधरों पर फैली उस मुस्कानी चादर मन ही मन ओढ़ के खुश हो लेता, उसके चेहरे का नूर मेरी दिनभर की थकन को छूमंतर कर देता। कई बार उसका उस ट्रैन से न आना मुझे बैचेन कर जाता। ऐसा लगता मानो जैसे कोई पहाड़ मुझे दबाये जा रहा है। 

 मुझे उसे देखे हुए पुरे दो महीने हो गए थे। मेरे लिए तो वो एक मुलाक़ात ही होती थी जहाँ मैं मन ही मन उसके चेहरे पर लटकती जुल्फों को अपने हाथो से उसके कान के पीछे कर देता, और मुझे चाहिए ही क्या था, बस इसी में जग की सारी ख़ुशी मिल जाती थी।

 वैसे अब मैंने वो शहर छोड़ दिया है,देखने में तो वो एक इंसानी बस्ती लगता था, लेकिन है वो एक जंगल।


लेकिन हाँ आज भी सपनों में उसका वहीँ लास्ट बेंच पे बैठ के इंतजार करता हूँ, उसी बेंच पर जहाँ मैंने उसकी हर अनकही बात को समझ लिया था लेकिन कहने वाली बात आज भी कहीं दबी सी है...