आँखों हैं कुछ रात जैसी नम

जैसे हुआ हो मुझे शाम होने का भ्रम


कहीं छूट सा रहा है

तेरे हाथ से मेरा हाथ


कही कुछ टूट सा रहा है

ये प्रेम के मोतियों से बने जेवरात


कुछ था जो शायद नहीं है हमारे बीच

क्या वही तेरे लबों ने कहा जिसे प्यार


ये किस्मत कहूं या बदक़िस्मती

ना तू थी रूबरू,ना तेरा रंज-ओ-ग़म


इक वक़्त जो गुज़र गया

इस दौर की परवाह किसे अब 


सब मिल्कियत बेफ़ायदा

जब प्यार होने का हो ग़म


आँखों हैं कुछ रात जैसी नम

जैसे हुआ हो मुझे शाम होने का भ्रम।।

#मलाल