कितना आसान होता है किसी को भुला देना,

बस कभी-कभी जब ज़िक्र होता हे उसका तो,

नाम हो जाती हैं आँखे और रुंध जाता है गला,

खो जाता हूँ कुछ देर के लिए उसकी यादों में,

और फिर जब लौट के आता हूँ बापस,

तो पता हूँ खुद को रूबरू इस सच से,

की सब कुछ सच तो नहीं होता,

वो जो सपना हम देखते है,

खुली आँखों से, दिन के उजाले में,

वो भी तो अब अपना नहीं होता...