हे पथिक! निरंतर चलता चल तू,
ये माया तेरी मंजिल कैसी,
मंजिल तो वो एक अलौकिक,
जिसके पथ पर चलता चल तू॥
तीव्र द्वेष और कंटक मन की,
आंधी तुझको पग-पग मिलती,
मन में रख विश्वास मगर तू,
ये कठिनाई हैं क्षण भर की,
तुझको जब इस मोह जाल से,
नहीं कोई है प्रेम मुसाफिर,
मंजिल तो वो एक अलौकिक,
जिसके पथ पर चलता चल तू॥
पग-पग मिलती स्वप्न सुंदरी,
सर्प दंश सा लेकर बैठी,
तू तो ठहरा वैरागी सा,
तुझको स्वापन से मतलब कैसा,
वैरागी का प्रेम पथिक न,
पथिक प्रेम है क्षण भर सा,
वैरागी का प्रेम मुसाफिर,
ये पथ पर चलते पग सा,
मोह जाल से परे मुसाफिर,
ध्यान धरे बस मंजिल का तू,
मंजिल तो वो एक अलौकिक,
जिसके पथ पर चलता चल तू॥


