एक हृदयविदारक घटना से आज मन बहुत दुखी हुआ। इतना सब हो जाने के बाद मानव प्रकृति से छेडछाड़ बंद नहीं कर रहा है।
कहीं पढ़ा था की मानव इस प्रकृति की सबसे उत्कृष्ट रचना है परन्तु आज उसी कृति का हिस्सा होकर स्वयं को लज्जित महसूस कर रहा हूँ।
अभी तक मैं प्रकृति की प्रलय से सिर्फ आशंकित था परन्तु अब मैं निश्चिन्त हूँ कि मानव ने विनाश के इस युद्ध को अब अंतिम मोड़ पर ला दिया है, जिसमे उसका विनाश निश्चित है।
अभी तक मानव दर्शकदीर्घा में मात्र एक दर्शक कि भांति बैठा था परन्तु अब वह इस युद्ध में उतर चूका है और यही उसने सबसे बड़ी भूल की। भूल- अपने अहंकार के मद में चूर उसे ये होश ही नहीं रहा की वो प्रकृति के विरुद्ध खड़ा हो गया है।
जिस प्रकार परिवार के किसी एक व्यक्ति द्वारा कोई अपराध होने पर पुरे परिवार को अपमान और समाज की यातना झेलनी पड़ती है, ठीक उसी प्रकार कुछ मूर्खो की वजह से सम्पूर्ण मानव जाती का विनाश बहुत नजदीक लग रहा है जबकि वो तो सिर्फ दर्शक मात्र है।