तुम न बिलकुल मेरी कविता की तरह हो,

एकदम शांत, मनमोहिनी और काल्पनिक,

तभी तो मेरी हर एक कही कविता की,

एकमात्र, अपरिभाषित नायिका हो,

जिसे हर बार एक नए रूप में,

नए भाव के साथ परिभाषित करता हूँ,

या यूँ कहो कि कोशिश मात्र करता हूँ,

क्योंकि जब भी तुम्हें सोचता हूँ,

तुम हर बार एक नई कल्पना की तरह,

उभरती हो मन के किसी कोने में, और 

फिर ढलती हुयी सांझ की तरह,

हो जाती हो गुम सूर्य के साथ..