कोन खिलाफ है भला किसको परवाह है

खंजर है हाथों में उनके पर मुर्दों के कहां जख्म लगता है ।


चिंगारी उठी है उठने दो ज्वाला भड़की है भड़कने दे

शमशान में पड़ी राख को भला कोन जला सकता है ।


हवाऐं हैं चलती हैं चलने दो खुदसे थम जाएंगी

मिट्टी को भला कहां तक उड़ा पाएंगी ।


बारिश की हल्की बूंदे हैं इन्हें बरसने दो

खुशबू को किरदार की भला कहां दवा पाएंगी ।


अभिषेक भदौरिया