घर से दूर रहना क्या होता है,
ये पूछो उन परिंदों से,
जो उड़ के आसमानों में ,
भटक से गये हैं अपने आशियानों से।
या फिर पूछ सको तो पूछो,
सड़क के उन निशानों से ,
जाने कितने घावों से बनी हैं जो
और भीगी हैं बच्चों के सिसकानो से ।
परिंदा ऊंचाई हासिल करता गया ,
सारा भूमंडल खुद ब खुद नपता गया,
फिर जब थक चुका ऊंची उड़ानों से,
और देखा जमीं पे वो उन आसमानों से ।
खुद को पाया बहुत दूर सच्चाई से ,
लौटने को भागा उस ऊंचाई से ,
घर पहुंचने में पर कतरते गए उंसके ,
लहू उंसके न दिखे पर हुक्मरानों से ।

