जहां सुंदर शाम सवेरा था
जहां अपना रैन बसेरा था,
उस गांव से नाता तोड़ के
हम आये थे मुंह मोड़ के ।
वो गांव छोड़ के आये थे
इक नया आशियाँ बनाये थे,
रोजी रोटी और भगदड़ की
अपनी दुनिया मे समाये थे ।
रेलों सड़को को बड़े किये
जाने कितने घर खड़े किए,
जिस शहर को हमने शहर किया
वो शहर ही अपने नही रहे ।
अब समझ मे कुछ ना आता है
शहर ,जो नजर वीराना आता है,
उस बैरी शहर को छोड़ के
अब गाव चले हम लौट के।।


