इक गांव था

गांव की गली थी

जो दूर जाते जाते

इक पेड़ से जा मिली थी ।

पेड़ बहुत बूढ़ा था

वो गली नौजवान थी

पर उस गली में खेलते 

हर बच्चे की वो जान थी ।

कितने लटकते थे

कितने झूल जाते थे

उस गांव का श्रृंगार थी

जब भी उसमे फूल आते थे ।

सालों से खिलाती रही

माँ की तरह झुलाती रही

कितने भी पत्थर मारे सबने

पर अपनी छाँव में सुलाती रही ।

इंसान फिर बड़ा हुआ

पैरों पर अपने खड़ा हुआ

खूब कंक्रीट फैला दिया

उस पेड़ को उसने काट दिया ।

रोई होगी क्या धरती न

आखिर उसकी सन्तान थी वो

पर लाज क्यूँ आयी गांव को न

आखिर उसका सम्मान थी वो ।

दूरों तक बस बागीचे थे

अब पत्थर पत्थर दिखता है

क्यूँ पेड़ निगल लिए हैं सब

हमने गांव बदल दिए हैं अब ।