रोये बहुत तुम इक जान की खातिर,

हम भी उससे शर्मिंदा हैं,

पर सोचा तुमने कभी भी क्या,

क्या क्या खाकर हम जिंदा हैं ।

मुर्गी बकरी मछली खाये,

क्या उनके थे मा बाप नही,

तुम रोते इक हथिनी के खातिर,

पर क्या बाकी का मरना पाप नही।