बिखरे पड़े हैं कुछ रोटी

गए थे जिसकी तलाश में,

देख इंसां छिटकी पड़ी है

इंसानियत उस लाश में ।

कुछ बच्चे हैं,कुछ बूढ़े हैं

तो कुछ हैं नौजवान भी,

आये थे जो सबका घर बनाने

लुट गया उन्ही का मकान ही ।

रोटी कहता मत देख मुझे

मैं हँस रहा न रो रहा ,

मेरे लिए थे जो अपनो से दूर

वो आखिर मुझी पे सो रहा ।