रात भर फिर अकेली रही चाँदनी
आज फिर चाँद को नींद आयी नहीं
ह्रदय में रही एक व्यथा की कथा
मौन अधरों ने फिर भी सुनायी नहीं
कूल से एक नदी के वो चलते रहे
साथ आने को हर पल मचलते रहे
नीर ही बंध है और बाधा भी है
नीर के संग ही स्वप्न बहते रहे
संग बहती रही सब व्यथा, वेदना
सागर में जब तक समायी नहीं
रात भर फिर अकेली रही चाँदनी
आज फिर चाँद को नींद आयी नहीं
दिवस साँझ सा ही रहा कुछ मिलन
एक आता रहा एक जाता रहा
पीर की लालिमा लिये यह गगन
इस विरह की तपन को बताता रहा
सूर्य घुलता रहा साँझ के जल में पर
ताप में अल्पता कोई आयी नहीं
रात भर फिर अकेली रही चाँदनी
आज फिर चाँद को नींद आयी नहीं
कोरे अम्बर में सुधियों के दीपक जले
प्रणय की आस थी पर अँधेरे तले
बाँध टूटा नयन का तो आँसू झरे
जो सुबह ओस बनकर कली पर मिले
यूँ तो तारे बहुत से प्रकाशित रहे
संवेदना पर किसी ने दिखायी नहीं
रात भर फिर अकेली रही चाँदनी
आज फिर चाँद को नींद आयी नहीं।


