
रात भर फिर अकेली रही चाँदनी
आज फिर चाँद को नींद आयी नहीं
ह्रदय में रही एक व्यथा की कथा
मौन अधरों ने फिर भी सुनायी नहीं
कूल से एक नदी के वो चलते रहे
साथ आने को हर पल मचलते रहे
नीर ही बंध है और बाधा भी है
नीर के संग ही स्वप्न बहते रहे
संग बहती रही सब व्यथा, वेदना
सागर में जब तक समायी नहीं
रात भर फिर अकेली रही चाँदनी
आज फिर चाँद को नींद आयी नहीं
दिवस साँझ सा ही रहा कुछ मिलन
एक आता रहा एक जाता रहा
पीर की
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