दुर्दशा की मौन स्वीकारोक्ति की पगदण्डियाँ -: एक छोटी सी यात्रा के बहाने ........


 ये यात्रा कम और एक घटना ज्यादा थी 2019 की डायरी पलटा तो यादें ताजा हो गयीं। डर , रोमांच और साहस तीनों से एक ही समय मुलाकात का किस्सा है ।


~ अभिनव राज त्रिपाठी


(ये यात्रा लगभग 2019 की गर्मी के मौसम के दौरान की है। उसी समय रात को ये संस्मरण लिखा गया था। )


बिगत रविवार अपने प्रिय मित्रों के साथ परानु बाबा के दर्शन करने के लिए जाना हुआ । मैं अपने प्रिय मित्रों के साथ जब वहां दर्शन करने पहुंचा तो पाठा के घनघोर पलाश के जंगलों के बीच प्रकृति के अनुपम सौंदर्य के परिपथ केंद्र में श्री परानु बाबा दिव्यासीन थे । ख़स्ताहाल रोड प्रशासन की दुर्व्यवस्था का शानदार उदाहरण थी । यद्यपि हम लोग रविवार को दोपहर को पंहुचे थे जिससे वहां पर हमारे अलावा और कोई अन्य नहीं था । वहां के मुख्य पुजारी जी ने परानु बाबा के बारे में प्रचलित किवदंती बताई जो हमें पहले से ही मालूम थी । लेकिन उन्होंने बीच जंगल मे एक बस्ती बसे होने की बात कही साथ ही दो स्थानीय देवियों के बारे में भी उन्होंने रोचक जानकारी से अवगत कराया । अब अपनी किशोरावस्था के दोष स्वरूप हम लोग वो शहर और उन देवियों के दर्शन के लिए उत्सुक थे। लेकिन सबसे बड़ी समस्या बिना सुरक्षा व्यवस्था किये दस्यु और हिंसक पशुओं से प्रभावित उस स्थान पर पंहुचने की थी जो बीच जंगल में स्थित था । काफी विचार विमर्श के बाद मैं परानु बाबा पर सब कुछ छोड़कर आगे बढ़ने पर सहमत हुआ । एक पहाड़ी के ऊपर चढ़ने पर हमें दो पगदण्डियाँ नजर आयीं जिनपर चलते हुए फोटो सेशन के कार्य को आगे बढ़ाते हुए बड़े आराम से हम लोग चले जा रहे थे । कुछ ही दूर चलने के बाद हमें दुर्ग नुमा एक विशाल भवन के ध्वंसावशेष नजर आए । इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते तुरन्त ही मैं उसमें प्रवेश कर गया लेकिन झाड़ फूस को ध्यान में रखते हुए अपने मित्रों को प्रवेश न करने की हिदायत दी । वहां पर ऐसा मालूम होता था कि जैसे सदियों से कोई यंहा पर नहीं आया और मैंने जब उसके अंदर जाकर देखा तो धूलधूसरित वो खंडहर अपनी दुर्दशा की साफ बानगी बयां कर रहे थे । यद्यपि उनमे की गई नक्काशी कुछ हद तक बहुत सुरक्षित अवस्था में थी । मैंने जब उन पत्थरों को बहुत ध्यान से देखा तो उनकी नक्काशी मध्यकाल की प्रतीत हो रही थी यानी कि लगभग 500 से 600 साल पहले की । पत्थरों की नक्काशी पर आंखे गड़ाते हुए मैं कल्पना में डूब गया तभी अचानक पास के पत्थरों से सरसराहट की आवाज़ आयी मैं अपनी सतर्कता एवं सूझ बूझ से तुरन्त उस भवन के बाहर हो गया । बाहर से उस भवन को देखने से ऐसा लग रहा था कि जैसे ये जगह बहुत कुछ कहना चाह रही हो । पलाश और घने जंगली घासों के बीच एक पत्थर पर खड़े होकर मैं चारों तरफ देख रहा था और ये कल्पना कर रहा था कि इस घने जंगल के बीच सिर्फ ये भवन क्यों बना ? क्या कभी यहां कोई बस्ती थी ? जैसे अनेक प्रश्न मेरे दिमाग़ में घूम रहें थें और मेरे मित्र धड़ाधड़ फोटो खींचने में व्यस्त थे । अपने मौन को भंग करते हुए बिना समय गँवाय मैंने अपने साथियों को आगे चलने के लिए कहा । पलाश के घनघोर पेड़ों के बीच बड़ी बड़ी घासों को रौंदते और हंसी मजाक के बीच सुनहरे सफर को यादगार बनाते हुए हम लोग आगे बढ़ रहे थे । आगे चलकर हम लोंगो ने उन देवी के दर्शन किये जिनके बारे में पुजारी जी ने बताया था कि यहाँ की रक्षा ये ही करती हैं । घनघोर जंगलों के बीच जंहा फोन का नेटवर्क भी सही से काम नही कर रहा था उस स्थिति में हम लोगों ने वँहा पर बिना डरे अपना काम कर रहे थे । उन देवी के चबूतरे के बाहर चारों ओर पत्थरों की एक बैरिकेडिंग थी जो यह सूचित कर रही थी कि अंदर जाना किसी खतरे से कम नहीं है । सूर्य अस्ताभचल हो चुका था और खोज के कई पड़ाव अभी अधूरे थे अतः हम लोग समय जाया न करते हुए आगे चलने के लिए राजी हुए । अब हमारे इन्वेस्टिगेशन का अंतिम पड़ाव एक और वनदेवी थी जिनके बारे में हमें ये बताया गया था कि वो लेटी हुई हैं । ख़ैर पगडंडियों को पकड़ते हुए हम लोग वहां तक पहुंचे । वो स्थल एक पहाड़ी नाले के बीच में था जंहा जल के कुछ स्रोत थे । वस्तुतः परानु बाबा के इतने बड़े जंगल में मुझे यह स्थल बहुत ही शांत और मनमोहक नजर आया । एक छोटी सी खड़ी पहाड़ी की तलहटी में वो जगह थी , बेहद ठंडी जगह और इतनी शांत जगह थी कि मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि अब तक मैंने इतनी शांत जगह कभी नहीं देखी है और वहां पर उपस्थित मेरे मित्र भी । तलहटी में स्थित एक पुराना बरगद का पेड़ और जमीन में लेटी उसकी एक डाल पर लिपटे लाल कपड़े उस स्थल की महिमा का बखान कर रहे थे । शायद आदिवासी लोग वहां अक्सर आते रहें हों खैर इतने बड़े जंगल के बीच सिर्फ इसी जगह हरियाली थी बाक़ी पूरा जंगल भीषण गर्मी के बीच अपनी हरियाली खो चुका था । मेरी तो बस यही इच्छा थी कि यंहा पर अधिक से अधिक समय दे संकूँ लेकिन तभी आसमान में काले बादल अपनी पूरी फौज के साथ बारिश के लिए तैयार होने लगे । मैं मजबूर था .......... शाम हो चुकी थी और फोन में नेटवर्क भी नहीं था । हल्की बारिश और घनघोर काले बादल उस निर्जन स्थान को और भयावह बना रहे थे । अपनी जिंदगी में मैंने पहली बार डर को महसूस किया था वो डर इसलिए था कि इतने सूनसान जंगल में हम तीन चार लोग और मुख्य मंदिर के परिसर से लगभग दो किलोमीटर दूर जंगल के बीच और ऊपर से बिगड़ा मौसम कब बारिश कर दे और हम सब कहीं रास्ता न भटक जाएं की लेने के देने न पड़ जाएं । अपने छोटे से दस्ते का नेतृत्व करते हुए मैंने अपने मित्र से कहा कि हमें तेजी से बढ़ना चाहिए । पगडंडियों को अपने बड़े बड़े कदमों से नापते हुए हम लोग तेजी से बढ़ रहे थे। ऐसी जगह जंहा पर खतरे बेसब्री से इंतजार करतें हों वहां पर से जल्द से जल्द हम लोंगो ने निकलना उचित समझा ।


(इस रोमांचकारी यात्रा के लिए मैं अपने मित्र ठाकुर परिवर्तन प्रताप सिंह जी का ऋणी रहूंगा ।)