सर्दियां जब थोड़ी और कड़वी हो जायेगीं, चिनार के हरे पत्ते, जब सफ़ेद बर्फीले लिहाफ़ में कहीं खो जायेंगे, तब मैं, एक ग़ज़ल लिखूंगा तुमपर. तमाम मुन्तशिर जज़्बातों को, समेटूंगा और, उन्हें छोटे महीन पानी की बूंदों सा बनाकर, रख दूंगा किसी शफ़ाफ़ अब्र में, और शायरी कह दूंगा उसको. तुम्हारी हलकी पिली, मुस्कुराहटों की शायरी. हमारे मिलने और बिछड़ने वाली रातों की शायरी. मुबाशरत के उन गर्म एहसासों की शायरी. ग़मज़दा शामों की, आवारा आंसुओं की शायरी. फिर यूँ हीं किसी दिन तुम्हारी सुलगती आहों पर, जाड़ों के बे-मौसम बरसात की तरह ये ग़ज़ल बरस जाएगी. धधकती आग लगी है दोनों के दिल में, उसपे ये लफ्ज़ जब बूँद बनकर गिरेंगे, सातों रंग उफ़क़ पे, जवाँ हो जायेंगे. मुझे सुकून मिल जाएगा, और तुम भी मेरे क़ाफ़ियों में घुलकर, सर्द हो जाओगी.