स्याह खून टपक रहा है,
जब से पुरवाई चली है,
तुम्हारे दिए कई ज़ख्मों पर,
वक़्त ने जो टाँके लगाए थे,
खुल गए हैं सब.
अजीब सा दर्द है.
मैं चीखता हूँ तड़प के,
लेकिन ये आवाज़,
न तुम तक पहुंचती है,
न मुझे सुनाई देती है.
कोई बू आ रही है,
मेरे बदन से शायद.
लोग मुझे देखते हैं,
और अपना रास्ता
बदल लेते हैं.
इससे पहले की
ये ज़ख्म सारे नासूर बन जाएँ,
मैं जीना चाहता हूँ,
एक बार फिर से.
इन बोलते सन्नाटों से,
बाहर जाना है मुझे.
उम्र भर की थकन के,
बोझ तले दबती,
एक सुबकती तमन्ना है.
अरे कोई है...?
कोई सुन रहा है....?
देखा… मैंने कहा था न,
ये आवाज़,
न तुम तक पहुंचती है,
न मुझे सुनाई देती है.