समय के समावेश में,
चुनौतियों का चिंतन था।
खोजा गर्भ विपत्तियों का तो,
अर्जित सच्चा आत्ममंथन था।।
जीवन की हर दौड़ में,
बाधाओ का झोल बड़ा।
विपत्तियों पर कूच करी तो,
कुछ छलांगों से मोल बढ़ा।।
अगणित विचारो के दलदल में,
विपत्तियों से घाव हरे।
विवेक संग जीत लिया तो,
फिर शूल पर भी पाँव धरे।।
यू तो मकड़जाल की उलझन में,
विपतियों की आहट है।
पर आँख भीच देख ले कोई,
ये ही अनुभव योग्य बनावट है।।
अभिमन्यु सिंह

