तुम्हें अब क्या कहूँ
दिल की ज़रूरत या मधुर स्मृति।
तुम तो खो गए अपने संसार में,
छोड़ के मुझे मझधार में।
समेट ली तुमने अपनी सारी गिरहे,
हम बैठे रहे इंतज़ार में।
जो था बिताया संग हमने,
क्या वो एक छलावा था,
तुम तो खो गये,
किसी और की परवाह में,
जो संग बोया था हमने,
पौधा प्रेम का वो अब लह्लाहने लगा है..
इसको तन्हा सींचते सींचते,
अब थक गयी मैं,
सुनों आ सको तो देखो
कितने परिंदों के
घरौदें है इस पर,
क्या हुआ जो एक,
"हमारा घर"न बन सका।