
'पापा याद बहुत आते हो’
आप से कभी कहा नहीं...
जब जब मैं रोया करती थी
माँ की बाँहो से,आपका भी आलंगन चाहती थी
आपने अकेले थाम ली ये सोचकर ज़िम्मेदारी घर की
हम सब महफूज़ रहे, आप झेले तकलीफें सारी
लूटा सारी खुशियों को अपनी हम पर
कैसे इतना शान्त ,खामोश बने रहते हो
पापा...
आप भी मन मे जज़्बातोँ के तूफान समेटे रहते हो
आप माँ के दिल जैसे कोमल हो फिर भी
ज़ाहिर नही करते क्यूँ इतना कठोर बने रहते हो
पल-पल बढते हर पल मे, जो यादों को मैं छुती हुँ
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