'पापा याद बहुत आते हो’ आप से कभी कहा नहीं... जब जब मैं रोया करती थी माँ की बाँहो से,आपका भी आलंगन चाहती थी आपने अकेले थाम ली ये सोचकर ज़िम्मेदारी घर की हम सब महफूज़ रहे, आप झेले तकलीफें सारी लूटा सारी खुशियों को अपनी हम पर कैसे इतना शान्त ,खामोश बने रहते हो पापा... आप भी मन मे जज़्बातोँ के तूफान समेटे रहते हो आप माँ के दिल जैसे कोमल हो फिर भी ज़ाहिर नही करते क्यूँ इतना कठोर बने रहते हो पल-पल बढते हर पल मे, जो यादों को मैं छुती हुँ आपकी दाढ़ी से खेलती ,कभी पैरो पर झूलती हर बातों में छुपी रहती हैं हिदायत आपकी, लड़कपन की मेरी गलतियों पर एक दोस्त की तरह समझाना हो ना आँखो से ओझल जब तक गाड़ी , बस स्टैण्ट पर ही खड़े रहना आये दूर अब जब आपसे तो जाना कैसे घर में मेरा बेफिक्री से सो जाना युँ इन यादों को सिरहाने रख लेती हुँ कब होगा अब घर आना ! यही सोचती रहती हुँ अब जब घर आओगीं आपको गले लगा कर सब कह दुँगी.. पापा आप से जो कभी नहीं कहा... - अभिलाषा रासौ 'राशी' ( @Rasho_Abhi )