कितने दिन गुजार गये इस छोटे से एक कमरे मे बिन-बोले , बिन बात करे... अपनी ही जन्जीरो मे जकड़े सपने कहीं खाक किये ईंट मिट्टी की इन चार दिवारो मे कैसे इक साथ गुजार दिये एक छत ,एक कमरे में बिन-देखे ,बिन-एहसास करे.. इक तुफान ले गया संग अपनेपन के ये बैमानी रिश्ते घिरे हुए थे जो झुठे किरदारो से कैसे बचे अपने ही भीतर उठती आंधी से जो गोली सी धसती जाती सीने मे घर कब मकान बन गया पुछती हुँ इन बे-जान समानों से यही कहीं पड़े होगें जज्बात जुड़े इस कमरे से बिन-हँसे ,बिन दर्द बयां करे... अरमान दफन किये कभी जख़्म कुरेदे आँशुओं के कम्बल से कभी खुद को लपेटे यूँ ही कितनी बार बिखरे कितनी बार सिमटे इस कमरे मे बिन थके ,बिन आहं लिये कई ख्याल पिरोये टुटी सी माला में देखो कितने रंग भरे इन तिड़ती दिवारो मे खामोशी भी शोर करती इस कमरे के अन्धियारे में चिल्लाते हुए ,कभी बिन सब्र करे..