एगो कविता मगही में [A Poem in Magahi]'s image
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एगो कविता मगही में [A Poem in Magahi]

हम हैरान हिय की क़ोई लिखल कविता न हय मगही में

इधर ऊधर भागहिय, फेन बैठहिय कविता लिखे लगी मगही में


गली कुचा में सुनहिय लोग कैसे बोलअ हथिन मगही में

ध्यान से सुनहिय सबके बोली-चाली मगही में


दिन-रात चिरैं जैसन चाएँ-चाएँ करत हथिन मगही में

ओखनी सब के गारी भी बढ़िया लग है मगही में


ठीक है को ठीक हक़ो, अच्छा आ गया को अच्छा आ गेलहु कहल जाय है मगही में

खाना खाए-खनवा खैलहु, चाय पिए- चैइआ पिलहु होवअ है मगही में


हम शहर में घुमल-फिरल चल हिय किताब खोजते मगही में

घुर के घरे आब हिय बिन कौनो लिखल शब्द पैले मगही में


घर पर माता जी परथना कर हथिन मगही में

हमर बेटा के बुद्धी देहु भगवान

ई कविता लिखेलअ चाह हय मगही में !



Surprised to learn that there is no written poem in Magahi

I run here and there then sit down to write a poem in Magahi


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