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तुम्हें में अपना रब समझकर

तुम जो नज़रों से कहती हो
में मन से उसे पढ़ लेता हूँ,
तुम्हें में अपना रब समझकर
मौन ही बातें कर लेता हूँ।।

तुम जब हवा बनकर चलती
में वृक्ष बन झूमता हूँ,
तुम्हें में अपना रब समझकर
हर झोंको पर शीश नवाता हूँ।।

तुम जब नदी बनकर वहती
में रेत सा थम जाता हूँ,
तुम्हें में अपना रब समझकर
हर क्षण स्पर्श पाता हूँ।।

तुम जब बसंत बनती
में पतझड़ बन जाता हूँ,<
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