क्या मैं अपनी बो कहानी लिखूं,
जो शुरू होने से पहले ही पूरी हो गई
बात मेरी तुमसे सदा ऐसी ही रही
जो शुरू भी न हुई और पूरी भी हो गई
अब ऐसी कहानी में होकर भी क्या करते
जिससे शरू हुई कहानी
जब उसी किरदार से दूरी हो गई
क्या मैं अपनी बो कहानी लिखूं,
जो शुरू होने से पहले ही पूरी हो गई
हम आये ही थे तुम्हारे होने लिए
तुम्हारे न हुए और सबके हो लिए
जब तुम ही यहाँ से जा चुकी थी
तो हम अधूरे ही पूरे हो लिए
एक छोर पर तो कहानी का अंत रहा
उस छोर पर तो अनन्त हो गई
जमाने को सुनने एक नई कहानी मिली
पर नादियां तो हमारी आंख से समंदर हो गई
क्या मैं अपनी बो कहानी लिखूं,
जो शुरू होने से पहले ही पूरी हो गई
~अभय दीक्षित


