एक चेहरा मैंने भी देखा था,
पर उसका भाव कभी न महसूस किया,
इतनी सी भी शिकन न थी उस चेहरे पर
लगता है उसने दुखों को सहज ही पी लिया।

उस चेहरे से जब किसी ने हाल पूछा,
बो क्षण में ही सारे ग़मों को भूल गया था,
बो बस इस बात को लेकर ख़ुश था,
कोई उसे गम देकर भी भूल गया था।।

उस चेहरे के अंदर भी,
न जाने कितने चेहरे छिपे हुए थे,
पर बो सारे कभी न बाहर आये,
बो सब वक्त के मारे हुए थे।।

बो चेहरे कोई और नहीं,
हम में से ही कई चेहरें हैं,
 बाहर से खुश दिख रहे,
अंदर न जाने जख्म कितने गहरें हैं।।
~अभय दीक्षित
#चेहरे