हर रोज अगर चाँद नजर आने लग जाएँ |

जितने रोजेदार हैं सब ईद मनाने लग जाएँ |

हम अपने दीयों को बुझाना पसंद करेंगे,

आप जैसी आंधियां गर उसको बुझाने लग जाएँ |

तेरी एक झलक मिल जाए अगर हमको,

हम तो हर शाम छत पर आने लग जाएँ |

खुदा करे उस दिन जल्द सुबह न हो,

जिस रात वो मेरे ख्वाब में आने लग जाएँ |

फिर तो मयखाने जाने की जरूरत न पड़े,

गर आप अपनी नजरों से पिलाने लग जाएँ |

खुदा कसम तुम तब याद आते हो बहोत,

जब कभी हम तुमको भुलाने लग जाएँ |

यूँ तो आसान बहुत है शायर होना,

पर एक शेर कहने में तुमको जमाने लग जाएँ |


~ अब्दुल रहमान अंसारी ( रहमान काका )