हर चीज को तरसते हैं किसान |
कर्ज के बोझ तले दबते हैं किसान |
ये देश की रीढ़ हैं अन्नदाता हैं, भाग्य विधाता हैं,
हम सबका पेट भरते हैं किसान |
किसानों का वोट बैंक न खिसके, साहब ने कहा है,
साहब को हर बार जिताते हैं किसान |
किसानों का शोषण कोई नई बात नहीं है,
दशकों से जुल्म सहते हैं किसान |
लागत बढ़ने से मुनाफा तो दूर,
उपज की वाज़िब कीमत भी नहीं पाते हैं किसान |
मंडी समितियां लूटने का अड्डा बन गईं,
सालों से इनमे लुटते हैं किसान |
मुंशी प्रेमचन्द ने लिखा था ये कभी,
दमन की चक्की में पिसते हैं किसान |


